BLOG

लोक अदालतों की संरचना (Composition of Lok Adalats)

लोक अदालतों की संरचना[Composition of Lok Adalats]

  • लोक अदालतों की संरचना (Composition of Lok Adalats) – वर्ष 2002 तक लोक अदालतें स्थाई रूप से कार्य करती थी |
  • वर्ष 2002 में इस अधिनियम में संशोधन करके लोक अदालतों को स्थाई बना दिया गया |
  • इन अदालतों की अध्यक्षता एक न्यायाधीश द्वारा की जाती है तथा इसमें दो अन्य सदस्य होते हैं |
  • यह आवश्यक नहीं है कि यह सदस्य न्यायाधीशों सामान्यता एक वकील तथा एक सामाजिक कार्यकर्ता इन अदालतों का सदस्य होता है |
  • Lok Adalats में व्यक्ति अपने मामलों की पैरवी स्वयं कर सकता है उसे वकील की आवश्यकता नहीं होती |

लोक अदालतों के कार्य [Functions of Lok Adalats] –

  • सभी लोक अदालतों को दीवानी अदालतों की मान्यता प्राप्त है यह पुन अपराधिक मामलों को भी दे सकते हैं जिनकी प्राकृतिक समझौते योग होती है |
  • यह अदालत  पारंपरिक अदालतों से अलग तरह से काम करती हैं इसमें सुलह समझौते को वरीयता दी जाती है |
  • यह अदालतें अधिकतर सिविल मामलों को देखते हैं “भूमि एवं संपत्ति संबंधित विवाद पारिवारिक विवाद”  मुकदमों को इन अदालतों के अंतर्गत लाया जाता है |
  • आपसी सहमति से समझौते होने के कारण इन अदालतों के निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती |
  • प्रथम लोक अदालत का आयोजन 6 अक्टूबर 1985 को सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीएन भगवती की अध्यक्षता में दिल्ली में किया गया था |

 पारिवारिक अदालत [Family court]

  • वर्ष 1984 में संसदीय विधि के द्वारा पारिवारिक अदालतों फैमिली कोर्ट की स्थापना का प्रावधान किया गया |
  • इस अधिनियम के अनुसार जिन शहरों की आबादी 10 लाख से अधिक होती होगी वहां पारिवारिक अदालतों का गठन किया जाएगा |
  • इसके अतिरिक्त अन्य शहरों में भी संसद के द्वारा पारिवारिक अदालतों का गठन किया जा सकता है |
  • राज्यों में राज्य सरकार के द्वारा उच्च न्यायालय की सलाह से पारिवारिक अदालतों की स्थापना की |जाएगी |
  • पारिवारिक अदालतों की प्रकृति जिला अदालतों के समान होती है |
  • इन अदालतों में एक न्यायाधीश और एक अतिरिक्त न्यायाधीश की नियुक्ति की जा सकती है |
  • न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने वाले व्यक्ति को भारतीय राज्य के अंतर्गत 7 वर्षों का अनुभव होना चाहिए |
  • पारिवारिक अदालतों में पति-पत्नी के बीच विवाह से संबंधित विवादों को हल किया जाता है
  • पत्नी को गुजारा भत्ता देने से संबंधित विभाग तथा अन्य वस्तुओं के हक का निर्धारण न्यायालय के द्वारा किया जाता है |
  • समस्या के समाधान के लिए प्राकृतिक न्याय का सहारा लिया जाता है तथा विवादों को सहयोग के द्वारा हल किया जाता है|
  • इसके अतिरिक्त परिवार अदालत में व्यक्ति अपने  मामले की पैरवी स्वयं कर सकता है |
  • परिवार अदालत के निर्णय के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है तथा जिन मामलों में दोनों पक्षों के बीच सहमति हो उसमें अपील का प्रावधान नहीं है |
  • अनुच्छेद 136 के तहत इसकी  अपील सर्वोच्च न्यायालय में भी की जा सकती है |

राजस्व न्यायालय [Revenue Court] –

  • राज्यों के भू राजस्व (Revenue) के संबंध में राज्य स्तर पर प्रथम न्याय प्रणाली का प्रावधान किया गया है जिसमें सबसे ऊपरी स्तर पर राजस्व मंडल बोर्ड ऑफ (Revenue) तथा सबसे निचले स्तर पर तहसीलदार का न्यायालय होता है इसका संक्षिप्त विवरण आधु लिखित है |
  • राजस्व मंडल(Board of Revenue) प्रत्येक राज्य में एक राजस्व मंडल होता है जो राजस्व संबंधी विवादों का निर्णय करने के लिए सबसे बड़ी अदालत है इसके निर्णय  की अपील राज्य के उच्च न्यायालय में की जा सकती है |
  • कमिश्नर (Commissioner) या आयुक्त भू राजस्व मालगुजारी संबंधी कार्य के लिए राज्य को कई कमिश्नरी ओं में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक कमिश्नरी का प्रधान कमिश्नर या आयुक्त कहलाता है |
  • आयुक्त के द्वारा जिलाधीश के फैसले की अपील सुनी जाती है और आयुक्त की अपील अपने राजस्व परिषद में होती हैं |
  • जिलाधीश(Collector) कलेक्टर मालगुजारी की वसूली के लिए हर जिले में एक जिलाधीश होता है जो तहसीलदार तथा सबडिवीजन मजिस्ट्रेट एस.डी.एम(S.D.M) के निर्णय के विरुद्ध अपील की सुनवाई करता है |
  • सबडिवीजन मजिस्ट्रेट एस.डी.एम(S.D.M)  जिला कई सब डिवीजन में विभक्त होता है और प्रत्येक सब डिवीजन के प्रधान को सब-डिवीजन मजिस्ट्रेट उपखंड मजिस्ट्रेट कहते हैं  यह जिलाधीश के अधीन रहते हुए सब- डिवीजन में राजस्व के मामलों की सुनवाई तथा शांति व्यवस्था संबंधी कार्य करते हैं|
  • तहसीलदार– सब-डिवीजन तहसीलों में विभक्त होता है और प्रत्येक तहसील में एक तहसीलदार होता है इसका प्रमुख कार्य मालगुजारी की वसूली तथा अपनी तहसील में शांति बनाए रखना है तहसीलदार की सहायता के लिए कई नायाब तहसीलदार होते हैं |
  • उपभोक्ता अदालत
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत उपभोक्ता अदालतों का गठन तीन स्तरों पर किया गया है |
  • सबसे निचले स्तर पर जिला उपभोक्ता फोरम(District Consumer Forum) डिस्टिक कंज्यूमर फोरम है इसके ऊपर राज्य स्तरीय उपभोक्ता(State level consumer) अदालत होती है जिसे राज्य उपभोक्ता आयोग स्टेट कंज्यूमर कमिशन कहा जाता है |
  • इसके ऊपर एक राष्ट्रीय उपभोक्ता अदालत होती है जिसे राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग (National Consumer Dispute Resolution Commission) नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमिशन कहा जाता है|
  • इसका मुख्य उपदेश वस्तुओं और सेवाओं के उपभोक्ताओं का शोषण रोकना है |
  • इसके माध्यम से ग्राहकों , उपभोक्ताओं की शिकायतें तथा विवादों का निपटारा किया जाता है |
  • राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद समाधान आयोग के निर्णय के विरुद्ध केवल सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है|
  • नोट(note) : राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता दो तरह की होती है आरंभिक अधिकारिता के तहत उन मामलों की सुनवाई करता है जिसमें बेची गई वस्तु यदि गई सेवा का मूल्य एक करोड़  से अधिक होता है यह अपने अपीलीय अधिकारिता(Jurisdiction) के अंतर्गत राज्य उपभोक्ता आयोग के विरुद्ध पीले सुनता है |
  • Composition of Lok Adalats

आभासी अदालत (e-Court)

  •  – न्यायालय (e-Court)  अदालत एक जटिल धारणा है जिसमें कई पक्ष शामिल है|  – न्यायालय की एक विशेष अदालत वर्चुअल कोर्ट (virtual court) कहते हैं भारत में इस विचार की शुरुआत सन 2003 में हुई तथा इसका सबसे पहला पक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग था |
  • 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में निर्धारित किया गया कि यदि किसी गवाह को समय के भीतर या बहुत अधिक खर्ची के बिना बुलाना संभव ना हो तो उसके एविडेंस(evidence)  रिकॉर्डिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, वॉइस कॉन्फ्रेंसिंग, के माध्यम से भी किया जा सकता है |
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्याय दिए जाने की प्रक्रिया को ही कुछ लोग दूरस्थ न्यायालय जस्टिस भी कहते हैं |
  • Composition of Lok Adalats

मोबाइल अदालत (Mobile court)

  • इस  अदालत  का सार यह है कि अदालत स्वयं जनता के पास पहुंचे ताकि जनता को न्याय प्राप्ति के लिए धन वा समय खर्च ना करना पड़े अदालत गांव से काफी दूर होती हैं |
  • और गरीब लोगों के लिए लंबी यात्रा करके बार बार अदालत पहुंचना कठिन होता है |
  • मोबाइल अदालत का पहला प्रयोग वर्ष 2007 में हरियाणा के मेवात जिले में किया गया है |
  • मोबाइल अदालत में बस के भीतर कार्य करती है बस के भीतर न्यायालय का जरूरी ढांचा उपलब्ध होता है |
  • इसे प्राया पहियों पर न्यायालय जस्टिस ऑन व्हील्स के नाम से भी जाना जाता है |
  • Composition of Lok Adalats

Leave a Reply

Your email address will not be published.