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Directive Principles of Policy (Part -4, Articles 36 – 51)

Directive Principles of Policy (Part -4,Articles 36- 51)

  • Directive Principles of Policy (Part -4, Articles 36 – 51) डॉक्टर अंबेडकर ने भी कहा था कि – “सामाजिक आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के बिना आजादी AUR राजनीतिक लोकतंत्र का कोई महत्व नहीं है” |
  • इसी भावना को ध्यान में रखते हुए संविधान सभा ने लोक कल्याणकारी राज्य”( Public welfare state) के निर्माण हेतु संविधान के (भाग – 4 में अनुच्छेद 36-51 )के मध्य आयरलैंड से प्रेरित होकर नीति निर्देशक तत्व(Directive principal of state policy) को शामिल किया गया |
  • संविधान सभा द्वारा –  निर्देशित इन सिद्धांतों को शासन(Governance) में तथा समग्र विकास हेतु मुख्य मानते हैं |
  • नीति निर्देशक तत्व – की प्राकृतिक मूल अधिकारों के विपरीत गैर न्यायोचित है अर्थात राज्य द्वारा इनका पालन न किए जाने पर न्यायालय में वाद दायर नहीं किया जा सकता |
  • संविधान सभा में डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि – लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता में होती है तथा चुनाव के द्वारा जनता ऐसी सरकारों को दंडित भी कर सकती है |

यह आरोप है कि –Directive Principles of Policy

  • नीति निर्देशक तत्व केवल आदर्शवादी है तथा वह राज्यों की मर्जी  पर छोड़ दिया गया है |
  • वर्तमान में इनकी क्रियान्वयन के आधार पर यह मत तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है |
  • इंदिरा गांधी के शासनकाल में समाजवादी लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीति निर्देशक सिद्धांतों को मूल अधिकारों पर भी प्राथमिकता दी गई |
  • मिनर्वा मिल्स मामले 1980 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों के संतुलन पर जोर देते हुए यह भी कहा कि -निर्देशक तत्वों को लागू करने हेतु संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है |
  • इन तथ्यों को अभी भी प्रभावशाली ढंग से लागू करने की आवश्यकता है |
  • डॉक्टर अंबेडकर ने इन्हें आर्थिक लोकतंत्र का आधार कहा था |
  • संवैधानिक सलाहकार बी एन राव ने इसे “शैक्षिक मूल्यों वाला निर्देश” बताया था आज भी इनकी प्रसंगिकता लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण के लिए मानी गई है |

नीति निर्देशक तत्वों के (भाग 4) और अनुच्छेद (36 -51) तक का विस्तृत विवरण

  • अनुच्छेद 36 राज्य की परिभाषा |
  • 35 लागू न होने पर न्यायालय में अप्रवर्तनीय होंगे |
  • 38 जनकल्याण के लिए सामाजिक व्यवस्था |
  • 39 भौतिक संपत्ति का सम्मान योग न्यायपूर्ण वितरण |
  • 39(A) समान न्याय एवम निशुल्क कानूनी सहायता |
  • 40 ग्राम पंचायतों का गठन अनुच्छेद |
Directive Principles of Policy (Part -4, Articles 36 – 51)

मौलिक अधिकारों से मजबूत नीति के निर्देशक सिद्धांत –

  • निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों के संशोधन का आधार भी हैं। उदाहरण के लिए, संपत्ति के अधिकार को कानूनी अधिकार बनाना और 86 वें संविधान संशोधन का आधार भी नीति निर्देशक है।
  • संविधान की प्रस्तावना सामाजिक-आर्थिक न्याय पर अधिक जोर देती है, जो नीति के निर्देशक सिद्धांतों के महत्व को स्पष्ट करती है।
  • तर्कसंगत प्रतिबंध देश की सार्वजनिक व्यवस्था, एकता, अखंडता और नैतिकता के आधार पर किया जाता हैमौलिक अधिकारों |

मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धांत अनुपूरक अवधारणा –

  • Fundamental Rights राजनीतिक न्याय स्थापित करता है, जबकि निर्देशक सिद्धांत सामाजिक और आर्थिक न्याय को बढ़ावा देते हैं।
  • दोनों को लागू करने से समग्र लोकतांत्रिक व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
  • मौलिक अधिकार व्यक्तिगत हितों पर जोर देते हैं, इसलिए दोनों व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
  • मौलिक अधिकार बताता है कि नागरिकों को क्या दिया गया है – जबकि नीति निदेशक बताता है कि और क्या दिया जाना बाकी है। इस तरह से नीति के निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों का मार्गदर्शन करते हैं।
  • सज्जन सिंह बनाम राजस्थान मामले में कहा गया था – कि निर्देशक सिद्धांत देश के शासन के मूल सिद्धांत हैं और संविधान के भाग 3 के प्रावधान को इन सिद्धांतों के साथ समझा जाना चाहिए।
  • मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ – मामले में, भाग 3 और भाग 4 को एक दूसरे का पूरक कहा गया था।
  • उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश – के मामले में, यह स्पष्ट किया गया था कि भाग 3 और भाग 4 एक दूसरे के समर्थक हैं।

मौलिक अधिकार और न्यायपालिका में नीति के निर्देशक सिद्धांत
  • चंपकम दोराईराजन बनाम मद्रास राज्य–  1951 में, पहली बार एक विवाद सामने आया कि किसे मौलिक अधिकारों और नीति के “निर्देशक सिद्धांतों में सर्वोच्चता” दी जानी चाहिए।
  • न्यायालय ने फैसला दिया कि मौलिक अधिकार प्राथमिक हैं और नीति का निर्देशक सिद्धांत एक सहायक के रूप में है, इसलिए मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं।
  • इस निर्णय को प्रभावी बनाने के लिए – प्रथम संविधान संशोधन 1951 में कहा गया था कि सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किया जा सकता है।
  • साथ ही, दूसरे(SEOND ) संविधान संशोधन 1955 में कहा गया था   कि यदि राज्य सार्वजनिक प्रयोजन के लिए संपत्ति अर्जित करता है और कुछ मुआवजा देता है, तो इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के वाद – 1967 में, सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों में संशोधन करने से इनकार कर दिया और निदेशक का पद मौलिक अधिकारों के अधीन था।

संशोधन -Directive Principles of Policy

  • 24 वां संशोधन 1971 उपरोक्त निर्णय को प्रभावी करने के लिए लाया गया था और कहा गया था कि संसद संविधान के सभी भागों में मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है
  • 25 वें संशोधन द्वारा – अनुच्छेद 31 को जोड़ते हुए, यह कहा गया था कि 39 बी, 39 सी में समाजवादी तत्व शामिल हैं |जो लागू होने पर अनुच्छेद 10 19, 31 जैसे मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने पर मान्य नहीं होगा।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 – में 24 और 25 वें संशोधनों को चुनौती दी गई थी, जहां अदालत ने उन्हें संवैधानिक घोषित किया और कहा कि वे मूल संरचना का उल्लंघन नहीं करते हैं।
  • 42 वें संशोधन 1976 द्वारा – बढ़ाया गया था और यह कहा गया था कि किसी भी नीति निर्देशक तत्व का प्रवर्तन मान्य नहीं होगा यदि यह किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • 42 वें संशोधन को “मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ” में चुनौती दी गई थी।
  • 1980 में अदालत ने इसे असंवैधानिक घोषित किया और कहा कि मौलिक अधिकार और निर्देश सिद्धांत एक दूसरे के पूरक हैं और इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए।

“डॉक्टर भीमराव अंबेडकर नीति निर्देशक तत्वों को भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता कहा था “|लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण तथा सामाजिक आर्थिक लोकतंत्र के निर्माण में इसका अत्याधिक महत्व है |

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