Wednesday, February 1, 2023
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Briefly Raja Yoga has been described by Swami Vivekananda and some methods of meditation have been described in it.

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संक्षेप में राजयोग का वर्णन स्वामी विवेकानंद के द्वारा किया गया है तथा इसमें कुछ ध्यान की प्रणालियों का वर्णन किया गया है

एकादश अध्याय से उद्धृत योगिनी मनुष्य के बाद पिंजर को दर्द कर देती है तब सप्तशती होती है और साक्षात निर्वाण की प्राप्ति होती है योग से क्या लाभ होता है ज्ञान पर योगी की मुक्ति के पद का सहायक है जिनमें योग और ध्यान दोनों ही वर्तमान हैं|

ईश्वर उनके पति पसंद होते हैं जो लोग प्रतिदिन एक बार दो बार तीन बार यह सारे समय महायोग का अभ्यास करते हैं उन्हें देवता समझना चाहिए योग दो प्रकार के हैं जैसे अभाव योग और महायोग जब तथा सब प्रकार के गुण से रहित रूप से अपना चिंतन किया जाता है तब उसे अभाव योग कहते हैं

जिसके द्वारा आत्मा का आनंद पूर्ण पवित्र और ब्राह्मण के साथ अभिन्न रूप से चिंतन किया जाता है उसे महायोग कहते हैं क्योंकि इनमें से प्रत्येक के द्वारा ही आत्म साक्षात्कार कर लेते हैं हम दूसरे जिन लोगों के बारे में शास्त्रों में पढ़ते हैं सुनते हैं वह सब लोग इस प्रयोग के जिस ब्रह्म योग में योगी अपने को तथा सारे जगत को साक्षात भगवत स्वरूप देखते हैं

1 अंश के बराबर भी नहीं हो सकते यही सारे युगों में श्रेष्ठ हैं यम नियम आसन प्राणायाम यह धारणा ध्यान और समाधि से राज्यों के विभिन्न अंग या सोपान का अर्थ है अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इससे चित्त शुद्धि होती है शरीर मन और वचन के द्वारा कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना क्यों निकले देना यह अहिंसा के लाता है |

धर्म के प्रति यह अभाव रखने से अधिक और कोई सुख नहीं है सत्य से सब कुछ मिलता है सत्य में सब कुछ प्रतिष्ठित है यह कथन को ही सत्य कहते हैं चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम है और थे तन मन वचन से सर्वदा सब अवस्था में मिथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य अत्यंत कष्ट के समय में भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण ना करने को अपरिग्रह कहते हैं

अपरिग्रह साधना का उद्देश्य यह है कि किसी से कुछ लेने से अपवित्र हो जाता है लेने वाला इन हो जाता है और वह अपनी स्वतंत्रता को बैठता है और पद एवं आसक्त हो जाता है स्वाध्याय संतोष सोच और ईश्वर प्राणी धान इन्हें नियम कहते हैं नियम शब्द का अर्थ है

नियमित अभ्यास और व्रत परिपालन व्रत उपवास या अन्य उपायों से सहयोग करना शारीरिक तपस्या कहलाता है वेद पाठ या दूसरे किसी मंत्रोच्चारण को शत-शत कर स्वाध्याय कहते हैं मंत्र जपने के लिए तीन प्रकार के नियम है बातचीत उपाय और मानस वाचिक से उपाध्यक्ष श्रेष्ठ है

और ऊपर से मानस जो जब इतने ऊंचे स्वर से किया जाता है कि सभी सुन सकते हैं उसे वाचिक जप करते हैं जिसमें होठों का स्पंदन मात्र होता है पर पास रहने वाला कोई मनुष्य सुन नहीं सकता उसे उपाश्म कहते हैं और जिसमें किसी शब्द का उच्चारण नहीं होता केवल मन ही मन जब किया जाता है|

Quoting from the eleventh chapter Yogini hurts the cage after man, then there is Saptashati and Nirvana is attained in person, what is the benefit of yoga, but knowledge is helpful to the Yogi’s post of liberation, in which both yoga and meditation are present God Their husbands are liked. Those who practice Mahayoga once daily, twice thrice, all this time, they should be considered as deities.

When this happens, it is called Abhava Yoga, and that by which the bliss of the soul is contemplated as the Absolute, the Pure, and integral with Brahman, is called Mahayoga, because it is through each of these that we realize the self, the others we know about.

Everyone reads and listens to the scriptures, the Brahma Yoga in which yogis see themselves and the whole world as God, cannot be equal even to a fraction, this is the best of all ages, Yama, Niyama, Asana, Pranayama, this perception, meditation and Samadhi means different parts or stages of states.

Ahimsa satya, asteya celibacy and non-violence, it purifies the mind, Never do violence to any creature by body, mind and speech, why let it out, it brings non-violence and there is no greater happiness than keeping this absence towards religion. Something is found in truth, everything is established, this statement is called truth, it is the name of not taking other’s thing by theft or by force, and the body, mind, promise,

always in all circumstances, the sacrifice of Gemini is celibacy even in times of extreme hardship. Not accepting any gift from a human being is called Aparigraha. The purpose of Aparigraha Sadhana is that by taking something from someone, the taker becomes impure and he loses his freedom and becomes attached to the post and self-satisfaction. Thoughts and God’s living beings are called Niyam.

The word Niyam means regular practice and observance of vows. Fasting or fasting is called physical austerity. Reciting Vedas or any other mantra one by one is called Swadhyay.

Types of rules are conversational measures and vice-versa superior to the mind-reader. And from above Manas, which is done in such a loud voice that everyone can hear it, is chanted by the reciter, in which there is only vibration of the lips, but no one living nearby can hear it, it is called Upashma and in which the pronunciation of a word is There is no mind only when the mind is done and its

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