Wednesday, February 1, 2023
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अमृतवाणी श्री राम कृष्ण देव के उपदेशों का विशाल संग्रह प्रस्तुत पुस्तक श्री रामकृष्ण मठ चेन्नई से प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तक सिंह श्री राम कृष्णा का हिंदी अनुवाद अध्याय 1 जीवन का उद्देश्य तुम रात को आकाश में कितने तारे देखते हो परंतु सूरज उगने के बाद उन्हें देख नहीं पाते किंतु इस कारण क्या तुम यह कह सकोगी कि दिन में आकाश में तारे नहीं होते हे मानव अज्ञान अवस्था में तुम्हें ईश्वर के दर्शन नहीं होते इसलिए ऐसा ना कहो कि ईश्वर है ही नहीं इस दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर जो इसी जीवन में ईश्वर लाभ के लिए जेष्ठा नहीं करता उसका जन्म लेना ही व्यर्थ है जैसी जिसकी भावना होगी वैसा ही उसे लाभ होगा भगवान मानव कल्पवृक्ष है उनसे जो जो मांगता है उसे वही प्राप्त होता है गरीब का लड़का पढ़ लिखकर तथा कड़ी मेहनत कर हाई कोर्ट का जज बन जाता है और मन ही मन सोचता है अब तो मैं मजे में हूं मैं उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा हूं अब मुझे बहुत आनंद है भगवान कहते हैं मजे में ही रहो किंतु जब वह हाई कोर्ट का जज सेवानिवृत होकर पेंशन लेते हुए अपने जीवन की ओर देखता है तो उसे लगता है कि उसने अपना सारा जीवन व्यर्थ ही गुजार दिया तब वो कहता है हाय इस जीवन में मैंने कौन सा उल्लेखनीय काम किया भगवान कहते हैं कि तुम्हें तुमने किया ही क्या संसार में मनुष्य दो तरह की प्रवृतियां लेकर चलता है विद्या और अविद्या विद्या मुक्ति पथ पर ले जाने वाली प्रवृत्ति है और अविद्या संसार बंधन में डालने वाली मनुष्य के जन्म के समय यह दोनों प्रवृत्तियां खाली तराजू के पल्लू की तरह समतोल स्थिति में रहती हैं परंतु शीघ्र ही तराजू के एक पल में संसार के लोगों का आकर्षण तथा दूसरे में भगवान का आकर्षण स्थापित हो जाता है संसार का आकर्षण अधिक विद्या का पल्ला भारी होकर छुप जाता है और मनुष्य संसार में डूब जाता है परंतु यदि मन में भगवान के प्रति अधिक आकर्षण हो तो विद्या का पल्ला भारी हो जाता है और मनुष्य भगवान की ओर खिंचा चला जाता है ईश्वर को जानो उसे जानने से तुम सभी कुछ जान जाओगे एक के बाद सुनने लगाते हुए सैकड़ों और हजारों की संख्या प्राप्त होती है परंतु एक बेटा डालने पर यूनो का कोई मूल्य नहीं होता एक ही के कारणों का मूल्य है पहले एक बात में बहू यानी बहुत पहले ईश्वर फिर जीव जगत पहले आप करो फिर धन कामना इसके पहले धन लाभ करने की कोशिश मत करो प्राप्त कर लेने के बाद संसार में प्रवेश करो तो तुम्हारे मन की शांति कभी नष्ट नहीं होगी तुम समाज सुधार करना चाहते हो ठीक है यह तुम भगवत प्राप्ति करने के बाद भी कर सकोगे स्मरण भगवान को प्राप्त करने के लिए प्राचीन काल के वीरों ने संसार को त्याग दिया था सबसे अधिक आवश्यक वस्तु है यदि तुम चाहो तो तुम्हें अन्य सभी वस्तुएं मिल जाएंगे पहले भगवत प्राप्ति कर लो फिर भाषण समाज सुधार आदि की सूचना मुसाफिर को नए शहर में पहुंचकर पहले रात बिताने के लिए

लेना चाहिए डेरे में अपना सामान रखकर उन्हें चिंता होकर शहर देखते हुए घूम सकता है परंतु यदि रहने का बंदोबस्त ना हो तो रात के समय अंधेरे में विश्राम के लिए जगह खोजने में से बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है उसी तरह इस संसार रूपी विदेश में आकर मनुष्य को पहले ईश्वर रुपए जरबिल राम-राम प्राप्त कर लेना चाहिए निर्भय होकर अपने नित्य कर्तव्यों को करते हुए संसार में भ्रमण कर सकता है किंतु यदि ऐसा ना हो तो जब मृत्यु की घोर अंधकार पूर्ण भयंकर रात्रि आएगी तब उसे अत्यंत प्ले और दुख भोगना पड़ेगा गोदाम में चूहों को पकड़ने के लिए दरवाजे के पास अडानी रखकर उसमें मुर्गे रख दिए जाते हैं उसकी सोंधी सोंधी महक से आकृष्ट हुए हैं और जाकर मर जाते हैं जीव का भी यही हाल है करोड़ों के घनीभूत समिति स्वरूप ब्रह्मानंद के द्वार देश पर अवस्थित होते हुए भी उस आनंद को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न कर संसार के क्षेत्र विशेष में लुप्त हो माया के फंदे में फंस कर मारा जाता है एक पंडित ने पूछा वाले कहते हैं कि महात्माओं का अस्तित्व है चंद्रलोक नक्षत्र लोक देवी आदि विभिन्न है और मनुष्य का शरीर इन संस्थानों में जा सकता है इस तरह की बातें बताते हैं महाराज जी वालों के बारे में आपका क्या बात है श्री राम कृष्ण ने कहा ईश्वर के प्रति भक्ति करते हैं अगर ऐसा हो तो ठीक है अगर उनका उद्देश्य ईश्वर का साक्षात्कार करना हो तो अच्छा है लेकिन याद रखो कि लोग चंद्रलोक नक्षत्र लोक आदि विषयों में डूबे रहना ईश्वर की खोज का सही रास्ता नहीं है उनके चरण कमलों में भक्ति होने के लिए साधना करनी पड़ती है अत्यंत व्याकुल उसे रोते हुए उन्हें भुगतना पड़ता है विभिन्न वस्तुओं में बिखरे हुए मन को जलाकर पूरी तरह से ईश्वर में ही लगाना पड़ता है चाहे चाहे वेदांत कहो चाहे कोई और शास्त्र ईश्वर किसी में नहीं है उनके लिए प्राणों के व्याकुल हुए बिना कहीं कुछ नहीं होगा भक्ति के साथ व्याकुल होकर उनकी प्रार्थना करनी चाहिए साधना करनी चाहिए ईश्वर लाभ इतना आसान नहीं है उसके लिए खूब साधना चाहिए क्या सभी लोग भगवान के दर्शन पा सकेंगे किसी को भी दिन भर भूखा नहीं रहना पड़ता किसी को सवेरे 9:00 बजे किसी को दोपहर के 2:00 बजे तो किसी को शाम के वक्त भोजन मिल जाता है उसी प्रकार जन्म जन्मांतर में किसी न किसी समय इसी जन्म में जाने के बाद सभी को भगवान के दर्शन प्राप्त होंगे छोटा बच्चा घर में अकेले ही बैठे-बैठे खिलौने लेकर मनमानी खेल खेलता रहता है उसके मन में कोई चिंता नहीं होती किंतु जैसे ही उसकी मां वह आती है वैसे ही वह सारे खिलौने छोड़कर मां मां कहते हुए उसकी ओर दौड़ जाता है तुम लोग भी इस समय धन यश के खिलौने लेकर संसार में निश्चिंत होकर सुख से खेल रहे हो कोई चिंता नहीं है पर यदि तुम एक बार भी उस आनंदमई मां को देख पाओ तो फिर तुम्हें धनवान या नहीं पाएंगे तब तुम सब देखकर उन्हीं की ओर दौड़ जाओगे

जीवात्मा और परमात्मा का संबंध किस प्रकार का है जिस प्रकार जल प्रवाह में एक पटियाला देने से जल के दो भाग हो जाते हैं उसी प्रकार एक अखंड परमात्मा माया की उपाधि के कारण जीवात्मा और परमात्मा के रूप में विधा विभक्त हुआ सा प्रतीत होता है पानी और बुलबुला वस्तुतः एक ही है बुलबुला पानी में उत्पन्न होता है पानी में ही रहता है और अंत में पानी में ही समा जाता है उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा मस्त रहे की है उनमें अंतर केवल उपाधि के तारतम्य का है एक शांत यानी सीमित है तो दूसरा अनंत असीम एक आश्रित है तो दूसरा स्वतंत्र जीव कैसी है गंगा का कुछ भाग ले और कहीं हमारी निजी गंगा है सरोवर में यदि एक शीशे का टुकड़ा छोड़ दिया जाए तो वह भी 12 बन जाता है उसी प्रकार ब्रह्म सागर में मग्न होकर जीव अपने सीमित अस्तित्व को खोकर ब्रह्म रूप हो जाता है ईश्वर अनंत है और जीव सीमित शांत शांत जीवंत ईश्वर की धारणा कैसे कर सकता है गुड़िया का समुद्र की गहराई नापने का प्रयास है समुद्र की गहराई से जाकर अपना अस्तित्व खो बैठता है तथा ईश्वर के साथ जाता है स्वयं ही मनुष्य के रूप में लीला करते हैं उन्हीं का खेल है उसे आते हैं और उनका हाथ जल जाता है वास्तव में से किसी में नहीं है आग में है फिर भी उनसे हाथ चलता है इसी प्रकार मनुष्य के भीतर विद्यमान रहने वाली शक्ति के कारण ही मन बुद्धि इंद्रिय कार्य करती है और जैसे ही श्रमशक्ति का अभाव हो जाता है वैसे ही यह मन बुद्धि निष्क्रिय हो जाती हैं बंधन जीव वास्तव में सच्चिदानंद स्वरुप है किंतु अभाव के कारण अपने स्वरूप को भूल बैठा है एक उपाधि आती है और जीव का स्वभाव बदल जाता है किसी ने शौकीनों की तरह काली धारीदार धोती पहनी देखना उसके मुंह से बाबू के प्रेम गीतों की धुन अपने आप निकल पड़ती है आदमी बूढ़ा हो जाता है मुंह से सीटी बजाने लगता है साहब की तरह उछल उछल कर जाता है मनुष्य के हाथ में रहे तो उसका गुण ही ऐसा है कि सामने चाहे जैसा भी कागज का टुकड़ा क्यों न पड़ जाए उसी पर किसने लग जाता है जिस प्रकार सांप अपने से अलग होता है उसी प्रकार आत्मा भी अलग होती है आत्मानं निर्मित है

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