Wednesday, February 1, 2023
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Is our present life a result of our past lives?

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क्या हमारा वर्तमान जीवन हमारे विगत जीवन का परिणाम है

हमारा हर कार्य जो हम करते हैं हर विचार जो हम सोचते हैं मन पर एक साथ छोड़ जाता है जिसे संस्कृत में संस्कार कहते हैं यह सभी संस्कार मिलजुलकर एक ऐसी मैती शक्ति का रूप लेते हैं जिससे चरित्र कहते हैं उसने अपने आप के लिए जिसका निर्माण किया है वही उस मनुष्य का चरित्र है यह मानसिक एवं दही क्रियाओं का परिणाम है जिन्हें उसने अपने जीवन में किया है संस्कारों की समस्त युवा शक्ति है जिससे यह निश्चित होता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य किस दिशा में जाएगा मनुष्य के मरने पर उसका शरीर तत्वों में मिल जाता है किंतु संस्कार मन में संलग्न रहते हैं और जो कि मन शरीर की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म तत्वों से बना होता है इसलिए विघटित नहीं होता क्योंकि भौतिक द्रव्य जितना ही सूक्ष्म अंतर होता है उतना ही दर्द होता है अगर श्याम मन भी विगत होता है हम सभी उसी विघटन की स्थिति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं इस संबंध में सबसे अच्छा उदाहरण जो मेरे मन में अभी आ रहा है चक्रवात का है विभिन्न वायु तरंगे विभिन्न दिशाओं से आकर मिलती है और एकाकार होकर मिलन बिंदु में वे संगठित हो जाती हैं तथा चक्र बना दी जाती है चकरा कार स्थिति में हुए गोलीकांड कागज के टुकड़े आदि नाना पदार्थों का एक रूप बना लेती है बाद में वे गिरा कर पुनः किसी दूसरे स्थान पर जाकर वही ग्राम फिर रखती है ठीक इसी प्रकार व शक्तियां जिन्हें संस्कृत में प्राण कहते हैं परस्पर मिलकर भौतिक पदार्थों के सहयोग से मंत्र शरीर की रचना करते हैं चक्रवात की तरह ही वह भी कुछ समय में इन पदार्थों को गिरा कर अन्यत्र यही कार्य पूरा करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं किंतु पदार्थ के बिना शक्ति की कोई गति नहीं इसलिए जब शरीर छूट जाता है मन सतत व रह जाता है और इसमें संस्कारों के रूप में प्राण कार्य करते हैं किसी दूसरे बिंदु पर जा कर यह पुनः नए पदार्थ का चक्र खड़ा करते हैं इस तरह तब तक भ्रमण करते रहते हैं जब तक संस्कार रूपी शक्तियों का पूर्णतया नहीं हो जाता संपूर्ण संस्कारों के साथ जब मन का पूर्ण हो जाता है तब हम मुक्त हो जाएंगे इससे पहले हम बंधन में हैं हमारी आत्मा मन के चक्रवात से ढकी रहती है और सोचती है कि वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाई जाती है जब समाप्त हो जाता है तब वह अपने को सर्वत्र व्याप्त पाती है उसे अनुभव होता है कि वह तो स्वेच्छा से कहीं भी जा सकती है वह पूर्णता स्वतंत्र है और चाहे तो अनेकानेक शरीर और मन की रचना कर सकती है किंतु जब तक चक्रवात की समाप्ति नहीं होती उसे उसके साथ ही चलना पड़ेगा हम सभी इस चक्रवात से मुक्ति के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं मान लो कि इस कमरे में कैद है और हम सबके हाथ में एक एक बल्ला है सैकड़ों बार हम उसे मारते हुए इधर से उधर करते हैं जब तक कि वह कमरे से बाहर नहीं चला जाता एक से एवं किस दिशा में वह बाहर जाएगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जब कमरे में था तो उस पर कितनी शक्तियां कार्य कर रही थी उसके ऊपर

उन सब का प्रभाव उस पर पड़ेगा हमारी मानसिक और शारीरिक क्रियाएं ऐसे ही आघात है मानव मन वो केंद्र है जिस पर आघात किया जाता है यह संसार मानो एक कमरा है जिसमें ₹1 केंद्र के ऊपर हमारे नाना कार्यकलापों का प्रभाव पड़ता है एवं इसके बाहर जाने की दिशा एवं गति इन सारी शक्तियों के ऊपर निर्भर होता है इस तरह इस संसार में हम जो भी कार्य करते हैं उन्हीं के आधार पर हमारा भविष्य जीवन निश्चित होता है इसलिए हमारा वर्तमान जीवन हमारे विगत जीवन का परिणाम है एक उदाहरण मान लो मैं तुमको एक ऐसी श्रृंखला देता हूं जिसका आदि अंत नहीं है उसे श्रृंखला में हर सफेद घड़ी के बाद एक काली घड़ी है और वह भी आधी अंतहीन है अब मैं तुमसे पूछता हूं कि वह श्रृंखला किस प्रकृति की है पहले तो इसकी प्रकृति पर लाने में तुम को कठिनाई होगी क्योंकि यह श्रंखला तो आनंद है पर शीघ्र ही तुमको पता चलेगा कि यह तो एक ऐसी श्रृंखला है जिसकी रचना काली और सफेद गाड़ियों को पूर्वा पर क्रम में जोड़ने से हुई है और इतना बड़जाल लेने से ही तुमको संपूर्ण श्रृंखला की प्रकृति का ज्ञान हो जाता है क्योंकि यह एक पूर्ण आकृति है बार-बार जन्म लेकर हम एक ऐसी ही आनंद श्रृंखला की रचना करते हैं जिसमें हर जीवन एक कड़ी है और इस कड़ी का आदी है जन्म और अंत है मरण अभी जो हम हैं और जो हम करते हैं किंचित परिवर्तन के साथ उसी की आवृत्ति बार-बार होती रहती है इस तरह अगर हम जन्म और मरण हिंदू कड़ियों को समझ ले तो हम उस संपूर्ण मार्ग को समझ ले सकते हैं जिससे होकर हमें कुछ जाना है हम देखते हैं कि हमारे वर्तमान जीवन को तो हमारे पूर्व जीवन के कार्यकलापों ने ही निश्चित कर दिया था जिस प्रकार हमारे वर्तमान जीवन के कार्यकलापों का प्रभाव आने वाले जीवन पर पड़ेगा उसी प्रकार हमारे पूर्व जीवन के कर्मों का प्रभाव हमारे वर्तमान जीवन पर पड़ रहा है कौन हमें ले आता है हमारे प्रारब्ध कर्म कौन हमें ले जाता है हमारे प्रिय मानकर और इसी प्रकार हम आते और जाते हैं जैसे लारवा अपने ही भीतर के पदार्थों से बने तंतुओं को मुंह से निकाल निकाल कर अपने चारों तरफ को या बना लेता है और उसमें अपने को बांध लेता है वैसे ही हम भी अपने ही कर्मों के जाल में स्वयं पद हो जाते हैं कार्य कारण नियम के इस जाल में हम एक बार उलझ गया जाते हैं कि इससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है एक बार हमने यह चक्र चला दिया और अब इसी में पिस रहे हैं इस तरह यह दर्शन बतलाता है कि मनुष्य अपने ही अच्छे बुरे कर्मों से बंद था चला जाता है आत्मा कभी आती है जाती है यह तो न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है प्रकृति आत्मा के सम्मुख गतिशील है और इस गति की छाया आत्मा पर पड़ती रहती है भ्रम वश आत्मा सोचती है कि प्रकृति नहीं

Our every action that we do, every thought that we think, leaves together on the mind, which is called Sanskar in Sanskrit, all these Sanskars together take the form of such a material power, which is called character, which he created for himself. It is the character of that man. It is the result of the mental and curative activities that he has done in his life. It is all the youthful power of the impressions which determine in which direction a man will go after death. It is found, but the impressions remain attached to the mind, and the mind, which is made of more subtle elements than the body, does not disintegrate, because the more subtle the difference is in the material substance, the more painful it is if the dark mind also passes away. Everyone is trying for the same state of disintegration. The best example in this regard which is coming to my mind right now is that of cyclone. Bullying is made in a dizzy car situation Pieces of paper etc. make a form of various substances, later they drop it and go to another place and keep the same village again. Similarly, the powers which are called Prana in Sanskrit, together with the help of physical substances, create the mantra body. Like a cyclone, it also sheds these substances in some time and moves ahead while completing the same work elsewhere, but without matter, there is no movement of energy, so when the body is left, the mind remains constant and in it the impressions of the sacraments. Prana works in the form of Prana, going to another point, it again creates a cycle of new matter, in this way it goes on traveling till the powers in the form of samskaras are complete with all the samskaras when the mind becomes complete. before that we are in bondage our soul is covered by the cyclone of the mind and thinks that it is being carried from one place to another when it ends it finds itself all pervading It is felt that she can go wherever she wants, she is completely free and If he wants, he can create many bodies and minds, but until the cyclone does not end, he will have to walk with it. I have a bat hundreds of times we hit it back and forth until it goes out of the room one and in which direction it goes will depend on how much was on it when it was in the room forces acting on him

All of them will affect him Our mental and physical activities are like this trauma Human mind is the center which is hurt The direction and speed of life depends on all these powers, thus whatever work we do in this world, our future life is determined on the basis of them only, therefore our present life is the result of our past life, let me give you an example. I give such a chain which has no end there is a black clock after every white clock in the chain and that too is half endless now I ask you what nature is that chain first you will find it difficult to bring it to its nature Because this series is a joy but soon you will come to know that it is a series which has been created by adding black and white trains in sequence on the east side and only by taking this much effort you get to know the nature of the entire series. Because it is a perfect figure, by taking birth again and again we get such bliss. We create a chain in which every life is a link and we are used to this link, birth and death are the end, what we are now and what we do, with slight changes, the repetition of the same keeps happening again and again. If we understand the Hindu links of death, we can understand the whole path that we have to go through. Will affect the life to come, similarly our past life’s deeds are affecting our present life, who brings us, our destiny, who takes us, taking us as our dear, and in the same way, we come and go like a larva of our own. By taking out the fibers made of the inner substances from the mouth, it makes it around itself and binds itself in it, in the same way, we ourselves become trapped in the web of our own actions. once we get entangled it’s hard to get out of it once we’ve started this cycle and now In this way, this philosophy tells that man was closed by his own good and bad deeds, the soul sometimes comes and goes, it never takes birth and never dies. The shadow of motion keeps on falling on the soul, the soul under illusion thinks that it is not Prakriti.

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